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हमीरपुर-सूखे सावन में विलुप्त हो रहीं बुंदेलखंड की परम्परायें

हमीरपुर-सूखे सावन में विलुप्त हो रहीं बुंदेलखंड की परम्परायें

सूखे सावन में विलुप्त हो रहीं बुंदेलखंड की परम्परायें
    नहीं सुनाई दे रहे आल्हा गायन, कजली, सावन गीत, नहीं दिखते झूले
हमीरपुर- लोक जीवन में आनंद, उत्साह, प्रेम-एकता और धर्म संस्कृति की भावना भरने वाली सावन मास से जुड़ी तमाम परंपराएं बुंदेलखंड की बदहाली के चलते तिरोहित होती जा रही है। आल्हा गायन, कजरी गीत, चपेटा खेल, सावन गीत, युवाओं के प्राचीन खेल, झूला गीत व सावन के झूले आदि परंपराएं यादों में सिमटती जा रही है। बुजुर्ग बताते हैं कि बुंदेलखंड सांस्कृतिक परंपराओं का धनी रहा है। बुंदेली साहित्य और संस्कृति में एक अनूठा और कच्ची मिट्टी जैसा सोन्धापन है। बुंदेलखंड के चर्चित कवि जगनिक, ईसुरी जैसे कवियों ने यहां के साहित्य को समृद्ध किया है। यहां के लोकगीत, लोककथा व लोक साहित्य ने परंपराओँ को जीवित रखा है। परंपराओँ का लोकजीवन में विशेष स्थान है। क्योंकि परंपराएं समाज को संस्कारित करती है। लोक संस्कृति में विद्यमान लोक मूल्य, लोकाचरण, लोकजीवन लोक साहित्य व लोक कलाओं से लोगों को जीवन जीने का आनंद भरी राह मिलती है। बुंदेलखंड की लोक संस्कृति के बारे में बुंदेलखंड में बुद्धिजीवी यही बताते हैं कि यह संस्कृति भारत के अनेक जनपदों की लोक संस्कृतियों से भी प्राचीन है। किन्तु बुंदेलखंड की परिस्थितियों के चलते अब आध्यात्मिक, धार्मिक व सामाजिक ऊर्जा प्रदान करने वाली श्रेष्ठ परंपराएं अब लुप्त होती जा रही है। सावन मास से जुड़ी हुई श्रेष्ठ परंपराओँ के संदर्भ में जानकारी देते हुए बुजुर्गों ने बताया कि सावन मास में बुंदेलखंड में झूला झूलने की परंपरा थी। मथुरा, वृन्दावन की यह परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। सावन का महीना आते ही आकाश में काले बादलों को देखकर उन्हें छूने का मन करने लगता था। जिस तरह श्रीकृष्ण गोपियों संग झूला झूलते थे। उसी तरह ठंडी फुहारों के बीच बच्चों से लेकर युवा वर्ग के लोग झूला झूलते थे। करीब ढाई दशक पूर्व तक गांव के अंदर और बाहर खड़े पेड़ों में झूले पड़े नजर आते थे। किन्तु अब प्राचीनतम परंपराओं में से एक झूला झूलने की परंपरा सिमट कर रह गई है। सावन में प्रेमरस से भरे सावन गीत प्रचुर मात्रा में गाए जाते थे। चैपालों में रात को सावन गीतो के बोल कानों में सुखद आनंद का अनुभव कराते थे। परन्तु चैपालों से भी सावन गीत विदाई ले चुके हैं। कजरी गीतों का गायन भी बुजुर्ग महिलाओं तक सीमित है। सावन में चपेटा (गुट्टा) खेलने की परंपरा कायम थी। बरसात होने के कारण बालिकाएं घरों के अंदर यह खेल खेलती थी। इसमें हारजीत भी होती थी और एक स्थान पर बैठकर आमोद-प्रमोद के साथ चर्चा-परिचर्चा करने का अवसर मिलता था। परन्तु अब प्रेम एकता को प्रगाढ़ बनाने वाला यह खेल भी खत्म हो चुका है। सावन में वीर रस और श्रृंगार रस से ओतप्रोत आल्हा गायन गांव-गांव में हुआ करता था। सावन आते ही आल्हा काव्य की अनेक पंक्तियां वातावरण में समरसता घोलने लगती थी। ‘कारी बदरिया तुमको सुमरो, कौंधा वीरन की बलि जाऊ लोग आल्हा बड़े चाव से सुनते थे। किन्तु अब आल्हा गायन बहुत कम मात्रा में होता है। महोबा के कजली मेला सहित बिदोखर, झलोखर, पतारा, बजेहटा, खन्ना, चिचारा व मवई गांव जहां आल्हा गायक रहते हैं। वहां पर वर्ष में एक बार आल्हा की गायकी अवश्य होती है। इसके साथ ही पूरे सावन मास में शारीरिक शक्ति के विकसित करने के लिहाज से कबड्डी, सर्रा, सिलोर, पिलारी (खो-खो) सहित कई खेल खेले जाते थे। किन्तु आजकल की पीढ़ी इन खेलों से अनभिज्ञ है। इस तरह बुंदेलखंड में मानवीय मूल्यों को सजग बनाने वाली परंपराएं बुंदेलखंड की बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदाओं की भीषण मार के परंपराएं भी खत्म होती जा रही है।

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