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हमीरपुर-मंदिर की दीवारें कहती हैं ऐतिहासिक रामायण-महाभारत की कहानियां

हमीरपुर-मंदिर की दीवारें कहती हैं ऐतिहासिक रामायण-महाभारत की कहानियां

मंदिर की दीवारें कहती हैं ऐतिहासिक रामायण-महाभारत की कहानियां
    मंदिर कन्नड़ और राजस्थानी वास्तुकला का अनूठा नमूना- डॉ. एसके दुबे
    जमींदार चंडीदीन दुबे ने ऐतिहासिक दक्षिणमुखी हनुमान सहित कई मूर्तियों की कराई थी स्थापना- लालू दुबे
हमीरपुर- जिले के खंडेह गांव स्थित राम जानकी मंदिर की दीवारें रामायण और महाभारत की कहानियां कहती हैं। भारतीय वास्तुकला के अनूठे उदाहरण इस मंदिर में पत्थरों पर शिल्पकारी का अद्भुत नजारा दिखाई देता है। यहां पत्थरों पर आकृति उकेर कर रामायण, महाभारत समेत कई पौराणिक प्रसंग जीवंत किए गए हैं। इसे 17वीं सदी में एक जमींदार ने बनवाया था। पुरातत्व विभाग अब इसका संरक्षण करेगा।लाल रेत के लिए देशभर में मशहूर कानपुर से सटे हमीरपुर को बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इसी जिले की मौदहा तहसील में 10 हजार आबादी वाले खंडेह में 17वीं शताब्दी में बना ऐतिहासिक राम जानकी मंदिर है। इस गांव का जिक्र अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी में भी है। तब यह इलाका कालिजर शासकों के अधीन था। उस समय यहां के जमींदार चंडीदीन दुबे ने एक एकड़ क्षेत्रफल में मंदिर बनवाया था। इसमें भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता की अष्टधातु की मूर्तियां प्रतिष्ठापित हैं। यहां दक्षिणमुखी हनुमान जी की भी प्रतिमा है। हमीरपुर से 60 किलोमीटर दूर खंडेह गांव सड़क और रेल मार्ग दोनों से जुड़ा है। कानपुर-बांदा रूट पर अकौना रेलवे स्टेशन ही खंडेह ग्राम का स्टेशन है। यहां से खंडेह गांव तक पक्का रास्ता है। ऐतिहासिक धरोहरों पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं। मंदिर के कर्ता-धर्ता लालू दुबे का कहना है कि यह मंदिर कन्नड़ और राजस्थानी वास्तुकला का अनूठा नमूना है। एक ही पत्थर पर पूरा बना प्रतीत होने वाला यह मंदिर बाहर से किलेनुमा दिखाई देता है। ग्रेनाइट पत्थरों से बना बुंदेलखंड का इकलौता मंदिर है, जहां त्रेता और द्वापर युग का सजीव चित्रण एक साथ है। भारत में ऐसी कलाकृतियां कर्नाटक और राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, अजमेर के मंदिर में देखी जाती है। मंदिर निर्माण के लिए चित्रकूट जिले के खोह गांव के पहाड़ों से पत्थर लाए गए थे। लालू दुबे का कहना है कि मंदिर के निर्माण के लिए कर्नाटक और राजस्थान से कारीगरों कोे बुलाकर करीगरी करवाई थी। तब शिल्पकारों ने ने न्यूनतम मजदूरी चांदी के 20 रुपये और अधिकतम 60 रुपये रोज का मेहनताना लिया था। पूरे मंदिर में लगी देवी देवताओं की प्रतिमा तराश कर बनाई गई हैं। प्रमुख त्योहार के अलावा सावन में यहां काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
इनसेट-
प्रस्ताव पर सरकार शीघ्र करेगी घोषणा
पुरातत्वविद डॉ. एसके दुबे ने बताया कि खंडेह का यह मंदिर अद्भुत है। ऐसा मंदिर उत्तर प्रदेश में संभवतः कहीं और नहीं है। इसके पुरातात्विक संरक्षण की कागजी कार्रवाई पूरी हो चुकी है। विभाग ने संरक्षण का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है। उत्तर प्रदेश सरकार से जल्द घोषणा होने की उम्मीद है।

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